क्या आम आदमी पार्टी को दिल्ली दंगों की जांच प्रणाली से कोई भी शिकायत नहीं है?


संसद सत्र शुरू हो चुका है और हमेशा की तरह भारतीय संसद की स्थिति हंगामेदार है। कृषि बिल पर टकराव को लेकर विपक्ष में बहुत समय बाद एकजुटता दिखाई दी है।

लेकिन हम चलते हैं थोड़ा पीछे। जिस दिन संसद सत्र शुरू हुआ उसी समय जेएनयू के पूर्व छात्रनेता उमर खालिद को दिल्ली दंगों में आरोपी बनाकर जेल में डाल दिया गया। दिल्ली पुलिस की इस कार्यवाही को जानकारों द्वारा सरकार की तरफ से अपने आलोचकों का उत्पीड़न करना बताया। विपक्ष की तरफ से कांग्रेस, भाकपा और राजद ने राष्ट्रपति से मुलाकात भी की और दिल्ली पुलिस की दिल्ली दंगों की जांच करने के तरीके की शिकायत भी की। दिल्ली पुलिस पर आरोप है कि वो सिर्फ एक पक्ष पर कार्यवाही कर रहा है और भाजपा समर्थित पुलिस बन कर रह गई है।

लेकिन एक पार्टी, आम आदमी पार्टी, जो दिल्ली की सत्ता पर काबिज है उसने एक बार भी दंगों की भूमिका पर ना तो बोला है और ना ही जांच पर कुछ टिप्पणी की है। इसे लेकर सवाल जरूर उठ रहें है कि क्या आम आदमी पार्टी की भी यही राय है कि जो जांच चल रही है, वो सही दिशा में आगे बढ़ रही है?


आम आदमी पार्टी का राजनैतिक रुझान

आम आदमी पार्टी ने ना तो सीएए को लेकर ज्यादा विरोध किया और ना तो दिल्ली दंगों पर भारतीय जनता पार्टी को कटघरे में खड़ा किया। दिल्ली दंगों में एक पैटर्न साफ देखा गया है। भाजपा के कुछ नेताओं ने भड़काऊ बयान दिए और उसके बाद दंगों ने भीषण रूप ले लिया। लेकिन आम आदमी पार्टी ने कभी भी इनके खिलाफ खुलकर नहीं बोला और ना ही अब बोल रही है। दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान भी आम आदमी पार्टी ने ' हनुमान जी ' का सॉफ्ट हिंदुत्व कार्ड खेला था और उसे उसका फायदा भी पहुंचा था।

दरअसल आम आदमी पार्टी अपने आपको एक राष्ट्रीय पार्टी ने रूप में पेश करना चाहती है जो भाजपा ओर कांग्रेस का विकल्प पेश कर सके। इसीलिए उसे लगता है कि दंगों पर बयानबाजी करना भाजपा के पाले में जाकर खेलने जैसा होगा जो वो बिल्कुल नहीं चाहती।आम आदमी पार्टी निकट भविष्य तक स्वास्थ्य, शिक्षा और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करना चाहती है।

यदि भविष्य में आम आदमी पार्टी कभी किसी राज्य में इन दोनों पार्टियों के साथ गठबंधन भी कर ले तो आप ज्यादा चौकिएगा नहीं। ये राजनीति है।

आम आदमी पार्टी की मजबूरी

दिल्ली दंगे आम आदमी पार्टी की उसी दिन मजबूरी बन गए थे जब उनके पार्षद ताहिर हुसैन का नाम दिल्ली दंगों में आया था। ये उसके लिए एक तरीके से सेटबैक रहा। यदि वो दंगों पर खुलकर आती है तो नाम उसका भी खराब होगा क्योंकि उनका एक पूर्व पार्षद दंगों में मुख्य अभियुक्त है। इसीलिए आम आदमी पार्टी ने सोचा कि ये उसके राष्ट्रीय महत्वांकक्षी योजना पर पानी फिर सकता है और उसका नाम खराब हो सकता है इसीलिए अच्छा ये ही है कि शांत रहा जाए।

इस बात में कोई दो राय नहीं रह गई है कि दिल्ली दंगों की जांच एक ही दिशा में बढ़ रही है। विपक्षी पार्टियों ने इस पर सवाल उठाए हैं लेकिन आम आदमी पार्टी शायद ही इस पर कभी बोले। ये शायद उसके धार्मिक सहिष्णुता के पैमाने पर भी फिट नहीं बैठता। ये विडंबना ही है कि जो पार्टी कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगाती है और भाजपा पर साम्प्रदायिकता का, वहीं नव नवेली पार्टी अपने ही दिल्ली के लोगों से मुंह फेर चुकी है और मोलभाव वाली राजनीति पर उतर चुकी है।

Writer - Himanshu Yadav



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