क्या पीटा इंडिया हिंदूफोबिक है या टीवी न्यूज़ चैनल टीआरपी के भूखे ?


18 जुलाई शनिवार। करीब रात के 10-11 बज रहे होंगे। लॉकडाउन के कारण काफी समय अब घर वालों के बीच ही गुजरता है। जब कभी कॉलेज खुले होते थे तो उस समय तक तो थक हार कर बिस्तर पर पड़ जाया करती थी। पर अब हाल कुछ ऐसा है की रात दिन बन गए हैं और दिन रातों से। खैर कोरोना के चलते घर में दिनभर इंस्टॉलमेंट में न्यूज़ चैनल ही चलते रहते हैं। उस समय भी एक न्यूज़ चैनल लगाए बैठे मेरा पूरा परिवार एक डिबेट को काफी गौर से देख सुन रहे थे। जहां एक तरफ असम में प्रकृति अपना प्रकोप फैला रही है, देश में धीरे-धीरे कोरोना का कम्युनिटी ट्रांसमिशन का खतरा भी पास आता नजर आ रहा है। उसी बीच प्राइम टाइम पर डिबेट एक ऐसे मुद्दे पर चल रही थी जिसका सर पैर ढूंढते-ढूंढते मैंने ही अपने सर पैर पकड़ लिए।

चैनल था रिपब्लिक भारत और डिबेट की हेड लाइन कुछ इस तरह थी : रेशम के धागे पर कैसे दिखा चमड़ा ? हिंदू त्योहारों पर हमला! निशानों पर हिंदू त्योहार क्यों? कुछ ऐसे ही जिन्हें पढ़कर कुछ समय के लिए मैं भी असमंजस में पड़ गई थी आखिर मसला क्या है।

कुछ वक्त और नजर गढ़ाई तब जाकर चीजें स्पष्ट हुई। मसलन मामला यह है कि Peta जो कि एक एनिमल राइट्स संस्थान है और काफी समय से एनिमल राइट्स और उनके साथ किए जा रहे उत्पीड़न और बर्ताव पर दुनिया भर में आवाज उठाता आ रहा है।

एक पोस्टर देशभर में लगवाए जिसमें एक गाय की तस्वीर के साथ कुछ इस तरह के शब्दों का प्रयोग किया गया : इस रक्षाबंधन कृपया मेरी रक्षा करें, चमड़ा मुक्त बने।


Peta India के इस कैंपेन को लेकर देश भर में आलोचना शुरू हो गई। ट्विटर पर भी इस मामले ने तूल पकड़ी आजकल कोई भी चीज ट्रेंडिंग पर आ जाती है। खैर, कुछ वर्ग के लोगों का यह कहना है कि रक्षाबंधन और चमड़े का आखिर क्या संबंध। रक्षाबंधन में तो केवल एक रेशम का धागा ही इस्तेमाल किया जाता है। वहीं कुछ लोग इतने आगे बढ़ गए कि सोचने लग गए कि यह पीटा का एक प्रोपेगेंडा है जो कि वह हिंदुओं के खिलाफ चला रही है और हमारे त्योहारों को टारगेट कर रही है। वहीं कुछ लोग ऐसे भी थे जो इसे दूसरे धर्म से कंपेयर करने लगी कि पीटा ने किसी और धर्म के त्योहारों पर जिनमें जानवरों को खाया तक जाता है उस पर क्यों नहीं ऐसा कोई कैंपेन चलाया। यह सवाल उठाया कि क्या पीटा हिंदूफोबिक है?


Peta India की ओर से अपने पक्ष में यह दलीलें दी गयी कि रक्षाबंधन वह त्योंहार माना जाता है। जब हर साल हम अपनी बहनों की रक्षा का प्रण लेते हैं। तो उसी तरह इस साल गाय की रक्षा का भी प्रण लें और इस साल से और अपनी पूरी जिंदगी गाय की रक्षा करें और कभी भी लेदर या किसी भी चमड़े से बनी कोई चीज ना खरीदें। Peta India ने अपनी दलील में यह भी कहा कि ऐसा ही पोस्टर उन्होंने ईद से पहले भी लगाया था जिसमें एक बकरे की तस्वीर का इस्तेमाल किया गया था।



अगर आपके दिमाग में यह डर नहीं है कि आपके धर्म या आपकी मान्यताएं संकट में है यह कोई उन्हें खत्म करने की कोशिश कर रहा है तो पहली बार पढ़ने देखने पर ही पोस्टर हो सकता है आपको सोचने पर मजबूर करें और जब कभी कोई चमड़ा या लेदर से बनी चीज देने लगे तो यही प्रण हमारे मन में आए। हिंदू धर्म में त्योहारों को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। हमारी भावनाओं से जुड़े हैं यह त्योंहार। तो क्या हम गौ रक्षा के लिए रक्षाबंधन त्योंहार के जरिए जागरूकता नहीं फैला सकते।

क्या ऐसा पहली बार है कि जब त्योहारों को लेकर हमें कुछ बेचा नहीं गया हो? त्यौहारों को लेकर बड़ी-बड़ी कंपनियां

अपने एडवरटाइजिंग करती हैं ताकि लोग उनका सामान खरीदें। तो अगर पीटा जैसी गैर लाभकारी संस्था जागरूकता के लिए इस्तेमाल करती है तो उसे एक धार्मिक एंगल क्यों दिया जा रहा है? पेटा के इस कैंपेन के द्वारा गौ रक्षा के प्रति जागरुकता और फैलाई जा सकती थी। बजाय इसके कि ना जाने कितने पहलू खान को भरे बाजार में भीड़ के न्यायालय में छोड़ दिया जाए जहाँ ना कोई केस है और ना ही कोई दलील और ना ही कोई न्याय ।


हर साल हजारों लाखों की संख्या में गाय और अन्य जानवरों की मौत चमड़ा इंडस्ट्री की वजह से होती है। वहाँ उन्हें उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है। कभी तो उनकी त्वचा हटाने से पहले ही मार दिया जाता है नहीं तो जिंदा ही उनकी त्वचा उखाड़ ली जाती है। जिसके बाद उन्हें या तो मरने के लिए छोड़ दिया जाता है नहीं तो मीट इंडस्ट्री के लिए भेज दिया जाता है।


आंखों से धर्म की पट्टी हटाएंगे तो समझ में आएगा कि पीटा इंडिया के इस कैंपेन में कहीं भी कोई धार्मिक ऐंगल नहीं है। पूरे कैंपेन में कहीं भी किसी धर्म को निशाना नहीं बनाया गया है। और यह पोस्टर केवल और केवल हमारे मन में बसे इस त्यौंहार से जुड़ी भावनाओं को लेकर गौरक्षा और लेदर ना इस्तेमाल करने की तरफ एक पहल थी। वही टीवी न्यूज़ चैनल ने इसे एक बड़ी खबर बना दिया जिस पर इस समय प्राइम टाइम डिबेट की जा सके। जिसे हम जैसे लोग बड़े मजे से अपने घरों में बैठ कर देखते हैं और छोटे-छोटे खिड़कियों में नजर आ रहे हैं प्रवक्ताओं की टिप्पणी और गुस्सैल भरी चीखें सुनते हैं जो कि अक्सर बिना सर पैर की बातें होती हैं जिनका कभी कोई निष्कर्ष ना तो निकला है और ना ही आगे शायद निकट भविष्य में निकलता नजर आ रहा है।


खैर गौरतलब अंत में बात यही है कि,

हर जानवर को जीने का हक है और हम इंसान केवल अपनी भूख के लिए या अपनी जरूरतों के लिए उनका ऐसा उत्पीड़न नहीं कर सकते और शायद पीटा इंडिया आपने कैंपेन के द्वारा यही सीख हमारे मन में डालना चाह रहा था।

Guest writer - Yeshassavi Pandita

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