झांसी की रानी के नाम पर कायरता से लड़ रही कंगना रनौत।



कंगना रनौत और शिवसेना के बीच की तकरार अपने चरम पर पहुंच गई है। पहले बीएमसी में सत्तारूढ़ शिवसेना ने कंगना के फिल्म स्टूडियो पर बुलडोजर चलवा दिए और उसके बाद कंगना ने खुलेआम उद्धव ठाकरे को निशाने पर लेते हुए बाबर, पीओके, पाकिस्तान जैसे विवादित राजनैतिक बयान भी दिए। यदि आप भारतीय इतिहास को उठाकर देख लीजिए, आपको शायद ही ऐसा कोई मौका मिलेगा जब किसी सेलेब्रिटी और सरकार के बीच ऐसी नोक झोंक दिखाई दे। शायद ऐसा पहली बार हो रहा है।

सुशांत सिंह राजपूत के लिए न्याय से शुरू हुई ये लड़ाई अब खुला राजनैतिक अखाड़ा बन चुकी है। सुशांत के लिए न्याय मांगने वाली कंगना एक राजनैतिक खिलाड़ी की तरह खेल रही है। पहले तो उन्होंने लोगों में ऐसा विश्वास जताया कि सुशांत की तथाकथित हत्या के आरोपी को वो जेल पहुंचाएंगी लेकिन अब ऐसा लग रहा की कंगना सुशांत की चिता पर अपनी रोटियां ही सेक रही हैं।

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे जिनको विपक्षी नेता भी इज्जत से बुलाते है, उनको कंगना रनौत नाम से बुलाती हैं। ये कंगना की दिलेरी कहीं जा सकती है लेकिन समझदारी नहीं। कंगना रनौत ने जिस तरीके से महाराष्ट्र सरकार को निशाने पर लिया है ऐसा लगता है कि ये किसी राजनैतिक पार्टी की सह पर ही किया जा रहा है। महाराष्ट्र भाजपा का परोक्ष समर्थन उनको मिल ही रहा है वहीं केंद्र सरकार द्वारा दी जा रही वाई ग्रेड की सुरक्षा को भी संदेह की नज़र से देखा जा रहा है।

कंगना के नए कर्मकांडो से ऐसा लग रहा है मानो वो राजनीति में आने की तैयारी कर रही हैं। उनका और भाजपा का प्रेम सालों से जगजाहिर है। कंगना के लिए ये वक्त एक तरीके से उनके राजनीति में बूस्ट अप की तरह है। बहुत से विश्लेषकों द्वारा ये कयास लगाया जा रहा है कि ये सब भाजपा और कंगना की मिलीभगत है ताकि महाराष्ट्र में महविकास अगाड़ी की सरकार को असंतुलित किया जा सके। कंगना रनौत के ट्वीट पढ़ कर ऐसा लगता है कि एक राजनैतिक प्रतिद्वंदी दूसरे नेता पर आरोप लगा रहा हो।


शिवसेना हमेशा से एक विवादित पार्टी रही है। उसके ऊपर हमेशा एक दक्षिणपंथी के साथ साथ उपद्रवी पार्टी होने का भी आरोप लगाया जाता है। एक दशक पहले और अब की शिवसेना में काफी बदलाव नजर आया है। जो शिवसेना ठाकरे परिवार की बेइज्जती पर महाराष्ट्र का चक्का जाम कर सकने की हिम्मत रखती थी वो कंगना जैसी एक आम अभिनेत्री के इतनी छींटाकशी करने के बाद भी क्यों चुप है, इसके बारे में कंगना और उनके समर्थकों को सोचना चाहिए। किसी की शालीनता का इतना गलत मतलब नहीं निकालना चाहिए। उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे को स्वभाव से शालीन बताया जाता है जो कि बालासाहेब ठाकरे के विपरित है। शिवसेना अपने आप को बदल रही है। वो एक नए दौर की पार्टी बनने की कोशिश कर रही है।

कंगना का रुझान पूरी तरीके से भाजपा की तरफ दिखता है। अभी जिस तरीके से विवाद नजर आ रहा है, वो कंगना के मुफ़ीद है। वो शिवसेना पर राजनीति से प्रेरित आरोप तो एक अभिनेत्री और आम इंसान की हैसियत से लगाती हैं लेकिन जब शिवसेना का जवाब आता है तो वो उसी को ढाल बनाकर पीड़ित कार्ड खेलने लग जाती हैं। कंगना को समझना चाहिए कि उन्हें किसी भी राजनैतिक पार्टी का मोहरा नहीं बनना चाहिए और हां यदि उनकी खुद की भी नेता बनने की इच्छा है तो उन्हें खुलकर मैदान में आना चाहिए ना कि पर्दे के पीछे से एक अभिनेत्री की तरह। जिस तरह वो लड़ रही है वो कायरता है।

Writer - Himanshu Yadav



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