तुच्छ मानसिकता की जननी : एफजीएम


क्या कभी सोचा है एक ऐसी हिंसा जिसका कोई लाभ नहीं ना ही सामाजिक रूप से न ही व्यक्तित्व रूप में। है तो सिर्फ नुक्सान तत्काल व दीर्घकालिक जटिलताओं और उम्र भर की मानसिक प्रताड़ना। जो न ही कोई धार्मिक गतिविधि द्वारा संचालित है और न ही किसी समुदाय का अभिन्न भाग। क्या है एफजीएम ? शायद एक सोच जो लड़कियों को छोटी नजरों से देखती है और उन्हें अपने निर्णय लेने से रोकती है।


क्या एक नारी होना सच में इतना भयावय है? देवी सी पूजी जाने वाली नारी पर इतना क्रूड़ व्यव्हार फिर चाहे वो त्रेता युग की देवी सीता हो या आज की सशक्त नारी। जैसे हैवानियत तो आज मानवता का दूसरा नाम है। कुछ ऐसे कार्य जो सिर्फ नारी को दुर्बल बनाते है, न ही इनका किसी प्रथा से ताल्लुक है और न ही किसी धर्म से और न ही इन गतिविधियों से किसी भी तरह का किसी को लाभ। सदयों से चली आ रही यह गतिविधियां ना ही सिर्फ शरीर को असहाय बनाता है व जख्म देता है, मानसिक रूप से दुर्बल बनाता है व जीने की आशा भी ख़त्म कर देता है। कभी सती तो कभी दहेज़ प्रथा। कभी बलात्कार तो कभी तस्करी। बरसों से कभी किसी सांस्कृतिक गतिविधि तो कभी शारीरिक शोषण यही होता आया है और यही हो रहा है।


इन्ही में एक ऐसी गतिविधि जिससे शयद ही हम इतने रूबरू न हो पर यह दुनियाभर में पीढ़ियों से चली आ रही है। ऐसा ही एक नाम है FGM यानी महिला जननांग विकृति जिसमें वे सभी प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं जिनमें बाहरी महिला जननांग (external female genitalia) को अपूर्ण रूप या कुल हटाने व महिला जननांग अंगों पर अन्य चोटें शामिल हैं यह गैर-चिकित्सा कारणों से होता है। गौर करने की बात यह है की इससे लड़कियों व महिलाओं को स्वस्थ रूपी कोई लाभ नहीं है बल्कि यह प्रक्रिया गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं को जन्म दे सकता है - लंबे समय तक रक्तस्राव, संक्रमण और बांझपन सहित - या यहां तक ​​कि मृत्यु भी।


एफजीएम ज्यादातर छोटी उम्र की लड़कियों और 15 साल की उम्र के बीच किया जाता है। एफजीएम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का उल्लंघन माना गया है। यह प्रक्रिया लिंगों के बीच भेदभर है। यह प्रथा किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य, सुरक्षा और शारीरिक अखंडता, यातना और क्रूरता, अमानवीय या अपमानजनक उपचार से मुक्त होने का अधिकार और जीवन के अधिकार का उल्लंघन करती है, वह साथ ही यह प्रक्रिया मृत्यु का कारण बनती है। यह अनुमान लगाया जाता है कि एफजीएम प्रति 100 प्रसवों पर एक से दो प्रसवपूर्व मौतों का कारण बनता है।



डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार आज दुनियाभर में 200 मिलियन से अधिक लड़कियां व महिलाएं इससे गुजरती है। यह अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के 30 देशों में ज्यादा सक्रीय रूप से किया जाता है।


एफजीएम के कुछ सांस्कृतिक और सामाजिक कारण है जिसकी वजह से इसका अभ्यास दुनियाभर में हो रहा है। कहीं इसे लड़की को पालने और उसे वयस्कता और शादी के लिए तैयार करने का एक जरूरी हिस्सा माना जाता है। तो कहीं इसका उद्देश्य विवाह से पहले कौमार्य और वैवाहिक निष्ठा सुनिश्चित करना है। एफजीएम कई समुदायों में एक महिला की कामेच्छा को कम करने और उसे विवाहेतर यौन कार्यों का विरोध करने में मदद करने के लिए माना जाता है। कुछ जगहों पर तो यह भी धारणा है की एफजीएम स्त्रीत्व और लज्जा के सांस्कृतिक आदर्शों से जुड़ा हुआ है।



कुछ समाजों में, एफजीएम बाल विवाह के साथ किया जाता। जिसके पीछे की धारणा यह है की छोटी उम्र में लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए बाहर जाना होता है व किशोर होने के कारण गर्भवती होने की संभावना अधिक होती है। जबकी इस उम्र में गर्भावस्था या प्रसव के दौरान मरने के जोखिम का सामना करना पड़ता है व किशोर माताओं से पैदा होने वाले शिशुओं के जीवन के पहले महीने में भी मृत्यु की संभावनायें अधिक होती है। आज दुनिया भर में लगभग 650 मिलियन लड़कियों का बाल विवाह किया गया है।


हानिकारक सांस्कृतिक प्रथाएं, जैसे बाल विवाह और महिला जननांग विकृति (एफजीएम), ऐसी भेदभावपूर्ण प्रथाएं हैं जो नियमित रूप से इतने लंबे समय से चलती आ रही हैं कि समुदाय और समाज भी इन्हें स्वीकृति दे रहे हैं। दुनिया भर में, लाखों लड़कियों और लड़कों ने किसी न किसी रूप में हिंसा, शोषण या हानिकारक प्रथा का अनुभव किया है, हालाँकि लड़कियों को इसका ज्यादा खतरा है। बाल विवाह व एफजीएम जैसी प्रथाएं घटिया मानसिकता व तुच्छ सोच की जननी है। ऐसी प्रथाएं लड़कियों के बचपन के साथ खिलवाड़ है व उनकी आजादी पर प्रश्न। ऐसी गतिविधियां उन्हें अपना भविष्य निर्धारित करने का मौका नहीं देती हैं।


आखिर ऐसा क्यूँ ?


Official Writer: ATISHA AGARWAL

 
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