हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दो महिलाओं की राय




सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के मामले में एक बड़ा फैसला किया था जिसमें महिलाओं को भी पिता की संपत्ति में बराबर हिस्सा मिलने का अधिकार दिया गया था। पहले ऐसा अधिकार नहीं था। लेकिन इस फैसले में एक खामी रह गई थी। इसमें ये नहीं बताया गया कि यदि किसी के पिता की मृत्यु का समय यदि फैसले की तारीख से पहले हो, तो फिर क्या उस व्यक्ति की बेटी को फायदा मिलेगा या नहीं?

अगस्त महीने के दूसरे हफ्ते में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इन सभी गलतफहमियों को दूर करने की कोशिश की है। अब कोई भी महिला अपने पिता की संपति में बराबर की हिस्सेदार होगी चाहे पिता की मृत्यु 2005 से पहले ही क्यों ना हुई हो।

सुप्रीम कोर्ट ने चाहे एक तरीके से अपने फैसले में सुधार मात्र किया है लेकिन मेरी दिलचस्पी इसमें रही कि महिलाएं इस बारे में क्या सोचती है? क्या वो अपने पिता की संपति में हिस्सा चाहती हैं या नहीं चाहती तो, क्यों नहीं ?

यहीं जानने के लिए मैंने अपनी मां ओर अपनी एक अविवाहित दोस्त से भी उनकी राय लेनी चाही।

मां का हिस्सा लेने से इंकार

मेरी मां से अपने मायके की संपति में हिस्सा नहीं मांगा। और जब मैंने इससे जुड़ा सवाल किया तो उनका कहना था कि 'उनकी मां यानी मेरी नानी मां ने भी अपनी संपति उनके भाइयों के नाम ही करवाई थी और कभी ससुराल पक्ष से भी इस पक्ष में कभी बात नहीं हुई' । उन्होंने इसके साथ ये भी जोड़ा की बहुत कम औरतें ही संपति से हिस्सा लेती है।

जब मैंने उनसे इस बारे में सवाल किया कि क्या एक पुत्री को भी एक पुत्र की तरह अपने पिता की संपति का हक नहीं मिलना चाहिए तो इसका उत्तर उन्होंने तपाक से देते हुए कहा कि पिता पक्ष एक बेटी को पढ़ता-लिखाता है, उनकी शादी करवाता है। मेरे दिमाग में ये ख्याल आता कि ये सब तो एक बेटे के लिए भी किया जाता है उससे पहले ही उन्होंने जोड़ते हुए कहा कि एक पिता और भाई के लिए बेटी की शादी के बाद भी बहुत जिम्मेदारी होती है जैसे उसके बेटे के जन्म पर 'छूछक प्रथा( अपने नाती के लिए दिए जाने वाले उपहार देना)', उसके बेटे की शादी के समय 'भात प्रथा(शादी के समय अपने नाती के लिए उपहार देना)'। इन सबमें पितृ पक्ष से योगदान की अपेक्षा की जाती है।

उनका ये भी कहना हुआ की एक पुत्री को हमेशा अपने पिता से आर्थिक मदद मिलती ही रहती है, ऐसे में अपने भाई की जमीन से भी हिस्सा भी लेे लेना एक नैतिक आचरण नहीं है।

उन्होंने इसको आगे बढ़ाते हुए कहा कि यदि किसी महिला का अपने भाई और पिता से मनमुटाव हो जाता है तो उसकी पिता की संपति से हिस्सा लेने की संभावना जब बढ़ जाती है ।

उनसे बात करके ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसा चलन अभी ग्रामीण इलाकों में ज्यादा नहीं है और अभी लोगों में इस कानून के बारे में स्वाभाविक समझ की भी कमी है।



दुविधा में दोस्त

मेरी दोस्त, हर्षिता ने सुप्रीम कोर्ट के सुधार का स्वागत करते हुए कहा कि अब तारीख की गलतफहमी की गुंजाइश नहीं रहेगी। जब मैंने उनसे पूछा कि क्या वो अपने पिता की संपति में से हिस्सा लेना चाहेगी तो उनका उत्तर साफ नहीं था।

उन्होंने कहा की उनका संपति से हिस्सा लेने का कोई इरादा नहीं है। लेकिन यदि उनके पति की बहन यदि अपना संपति का हिस्सा ले लेती है तो उनके ऊपर भी अपना हिस्सा लाने का नैतिक दवाब होगा चाहे उनके पति उनसे ऐसा करने का कहे ही ना।

उन्होंने इसका दूसरा पक्ष समझाते हुए कहा कि वैसे तो बेटा और बेटी में कोई फर्क नहीं रहता लेकिन फिर भी बेटी को इस तरीके से वंचित रखना भी तो गलत है ना। बेटा और बेटी तो पिता की ही संतान है ना तो फिर शादी के बाद ऐसा क्या हो जाता है कि बहन या बेटी से हिस्सा ना मांगने की ही उम्मीद की जाती है।

उन्होंने अपनी बात का अंत करते हुए कहा कि वो अपने भाई से संपति में हिस्सा नहीं लेंगी लेकिन अपने भाई से अपेक्षा करेंगी कि वो हमेशा सुख-दुख में साथ खड़ा रहे।

गौर करने वाली बात ये है कि ग्रामीण इलाकों में आपको देखने को मिलेगा की ऐसी महिलाएं लगभग पांच प्रतिशत ही होगी जिन्होंने अपने पिता की संपति में से हिस्सा लिया हो। वहीं शहरी इलाकों में ये प्रतिशत बढ़ा हुआ ही मिलेगा। रिश्तों में सहभागिता और शहरी इलाकों में संपति लेने का बढ़ता चलन इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।

13 views
 

Subscribe Form

  • Twitter
  • LinkedIn
  • Facebook

©2019 by vinyasa. Proudly created with Wix.com