हिन्दू संस्कृति |



हिन्दू संस्कृति मनुष्य के जन्म के साथ शुरू नहीं होती ना ही मरण के साथ खत्म होती है। सांसारिक सुखों के माध्यम से अथक यात्रा चलती रहती है ।इसे सांसारिक यात्रा कहते है। प्रश्न है संसार क्या है ।स्वाद सुगंद , रंग, स्वर और बनावट , जिस तरह मानव शरीर पाँच तत्वों से बना है । उसी तरह संसार भी पॉंच महाभूतों से बना है ।

जन्म का मतलब होता है - शरीर व दिमाग इसके मेल से जोह समर्थ बनता है । सांसारिक जीवन का आभास करता है । जन्म कहलाता है ।मृत्यु का होना इस का अंत नहीं होता है। बस एक अस्थ से दूसरी आस्था में जाना होता है।

जब शरीर वे दिमाग का अंत हो जाता है तब केवल आत्मा बचती है। आत्मा अमर होती है, दिखाई नहीं देती । इस को कोई परिभाषित नहीं कर पता येह ब्रमांड का जीवन सिद्धांत है । हिन्दू धर्म में जीवन की चार अवस्थाये होती है -

१ धर्म

२ अर्थ

३ काम

४ मोक्ष



एक जीवन श्वास लेने वाला प्राणी जीवन और मृत्यु चक्र से गुजरता है ।सक्रियता और निश्क्रियता के दोर से गुजरता है।अनंत पुरकथवयों में एक शाश्वत सत्य लिखा है। लेकिन उसे पूरी तरह से समझना मुश्किल होता है। हिन्दू सनातनधर्म में पेड़ भी पूजे जाते है, पशु - पक्षी भी पूजे जाते है । जो पारिवारिक सदस्य मृत्यु प्राप्त कर लेता है। उसकी आत्मा को भी हिंदुवो में पितृदेव के रूप में जाना जाता है और पूजा जाता है ।सनातनी हर जीव के कण कण में किसी न किसी परमात्मा का रूप दिखता है। इसी लिए हिन्दू धर्म को अधिक महत्व दिया जाता है। हिन्दू धर्म सत्य के आधार पर चलता है।

अहिंसा परमो धर्म: ही इसका मूल सिद्धांत है।



सत्य सनातनी मनुष्य अपने धर्म को नहीं छोड़ता चाहे प्राण ही क्यों न चले जायें।अनेक ऋषि मुनियों ने धर्म के नाम परअपने प्राण न्योछावर कर दिए। कही राजा महाराजाओं ने भी धर्म के लिए अपना राजपाठ छोड़ दिया।

राजा हरिश्चंद्र ने सत्य धर्म की रक्षा के लिए राजपाठ छोड़ कर अन्य के घर नौकरी करने लगे थे।उन्ही के वंश में अनेक राजा हुऐ जिन्होंने अपने अपने वचनो के लिए प्राण त्याग दिए - रघुकुल रीती सदा चली आए , पार्न जाये पर वचन न जाये।


चन्द्रवंशियो में श्रीकृष्णावतार में श्री कृष्ण ने सत्य धर्म की रक्षा के लिए पांडवो का साथ दिया और बहोत जतन से कोवारो है समूल नाश करवाया क्योकि वे धर्म विरुद्ध आचरण करते थे । इसी कारण श्री कृष्ण को भी श्राप मिला था, उस श्राप के कारण कृष्ण के वंसज सभी आपस में हे लड़कर समाप्त हो गए थे। स्वमभ कृष्ण उसी गांधारी के श्राप के कारण खुद भी मृत्यु लोक छोड़कर चले गये।भारत देश कई वर्षो तक अन्य धरमदेहो की गुलामी में रहा उसका मूल कारन यही था - संततानियो की प्राण प्रतीक्षा वचन। अन्य धर्म वालो के ऐसा कोई बंधन नहीं था। उसका फायदा उन्होंने उठया और हिंदुवो पर अत्याचार किया गुमाल बनाया लाइकेन फिर भी हिन्दुओं ने अपने आन बान शायन को नहीं छोड़ा।धर्म के विमुख नहीं हुए इसी कारण आज संसार में हिन्दू धर्म सबसे श्र्ष्ठ व पुरातन माना जाता है ।

(Guest Writer) - Moolchand Shastri

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