ॐ का विशेष महत्व |


हिंदू धर्म ग्रंथों में ओम का विशेष महत्व है। यह कल्याण कारक पापनाशक मोक्ष दायक शब्द माना जाता है। इसका निर्माण 5 अक्षरों में हुआ है । अ- कार उ- कार म -कार‌ नाद शब्द कालव कला - इस रूप से बना ॐ प्रणव कहलाता है।प्रणव का अर्थ- प्र प्रकषेण - ण न=नयेत व= युष्मान अर्थात या अपनी उपासको को को बिना किसी भी बाधा के बलपूर्वक मोक्ष द्वार तक पहुंचाता है ।

प्रणव के भेद दो बताए गए हैं।

१.सूक्ष्म

२.स्थूल

एक अक्षर रुप ॐ सूक्ष्म प्रणव कहलाता है। ये दोनों आपस में एक दूसरे मे मिले हुए हैं। स्थूल में सूक्ष्म रमा है। सूक्ष्म में स्थूल पहचान रोम रोम में रमा हुआ है।घट - घट में तू इसको जान स्थूल में सूक्ष्म, सूक्ष्म में स्थूल‌ की पहचान को बिरला योगी पुरुष ही कर सकता है।साधकों ने इसके दो मार्ग अपनी सुविधा के अनुसार बनाये , साधक जिस मार्ग को अपन्नाना चाहता है , वही श्रेष्ठ माना जाता है।

१. निवृत्तिमार्ग- जो साधक निष्काम भाव के बिना फल की इच्छा के साधना करता है। उसको स्थूल दीर्घ प्रणव की साधना करनी चाहिए।

२.प्रवृतमार्ग - जो साधक किसी फल की आशा मन में लेखकर साधना करता हैं उसे सुक्ष्म प्रणव की साधना करनी चाहिए।

योग साधना के तीन प्रकार होते हैं।

१. क्रिया

२. जप

३. तप‌



१ क्रिया - जो धन आदि वैभव पूजन सामग्री को लेकर हाथ आदि अंगों से करन्यास अगन्यास‌ ह्रदय न्यास आदी क्रिया करके साधना करता है वह क्रिया योगी कहलाता है।


२. जप - जो शब्द निर्विकार कामना रहित शांत चित से निरन्तर जप करता है, जपयोगी कहलाता है।


३. तप योगी- जो इन्द्रीयौ को जीतकर अपने मन को जीतकर साधना करता है । वह तप योगी कहलाता है ।


अब प्रश्न आता किसी योगी पुरुष को जपसाधना क्योकरनी चाहिए ॐ प्रणव जप साधना से साधक को किस तरह का ज्ञान आभास प्राप्त होता है ?

इसके विषय में शिव अवतार गोरक्ष नाथ जी ने कहा है -"ॐ ही सबुद सबद ही कूञ्जी सबद भया उजियाला कांटा सेती कांटा खूंचे कूची सेती वाला |"

अर्थात सभी शब्दों का शब्द और सभी शब्दों का भेद खोलने की चाबी और सभी तरह के अज्ञान अधियारों को इर करने की क्षमता ॐ शब्द में है। जिस प्रकार लोहे के काटे से लोहा काटा जाता है लोहे की चाबी से ही लोहे का ताला खुलता है उसी प्रकार ॐ शब्द से पूरे भेद खुलते हैं।



एक ओंमकार सतनाम्।



#om #world

 

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